क्यों
यारा कुछ बातें तुम्हें बैठकर बतानी थी ,
यारा कुछ बातें तुम्हें बैठकर बतानी थी ,
एक cup coffee तेरेसंग बाँटनी थी |
पूँछना था तुझे , क्या याद भी हूँ मैं ?
अरे वही तो हूँ ,जो तुझे देखके पगलोंकीतरह मुस्क़ुराती थीं ,
बस बेवज़ह हँसके निकल जाती थीं |
हाँ , मुझे तो तुम पूरे के पूरे याद हो ,
वही लम्बी उँगलियाँ , वही अदाएं , तूम्हारे घुँगराले बाल , वही लेबाज़
वही ग़ुरूर , वही चाल , जैसे नई बोतल पुरानी शराब
शराब से याद आया ज़नाब , हमपे आपका नशा सा था !
हिम्मत तो हममें तबभी थी , पर वक़्त थोड़ा ख़राब सा था
वैसे महोब्बत तो की आपने भी थी ,
शायद बोलने में कच्चे थे |
पता हैं मुझे , table पर पड़े ठन्डे चाय के मेरे cup खुद नहीं बदला करते थे !
आजभी मेरा वही सवाल हैं जो पहले था ,
क्या एक इन्कार देना इतना भी मुश्किल था ?
एक इन्कार का ही तो इज़हार किया था !
वो भी न दे पाए आप ,
"झल्ली हो" कहेकर मुस्कुरा दिए ,' हाँ 'भी नहीं कहा साफसाफ
कर देते इन्कार तभी , तो बुरे से बुरा क्या हो जाता ?
एकतरफ़ा प्यार मानकर ज़िन्दगी काँट लेते ,
क्योंकि अग़र एकतरफ़ा सच्चा था तो एकतरफ़ा ही अच्छा था ,
एकतरफ़ा ही अच्छा था , हमें शायद कोई और मिल जाता
माना आपको भुला नहीं पाते पर अब ये हररोज़ ख़ालीपन हमसे सहा नहीं जाता
आजकल तो कई गहरे हादसे होते हैं मेरे साथ !
सपनेमें भी याद आती है सारी कही-अनकही बात
जो तुमसे कहना चाहती थी ,
जो तुमसे कहना चाहती थी ,
इसीलिए यारा एक cup बाँटना चाहती थी'
परसों भी एक हादसा हुआ ,
न जाने आँचल किसने थाम लिया ,
पलकें उठीं ,नज़र मुड़ी ,
बड़े ग़ुस्से में मैनेतो आँचल ज़ोरसे खींचना चाहा था
पर कर न पाई ऐसा , क्योंकी वो तो तुम्हारी यादोंपे जो अटका था !
याद हैं हमारी दीवार पे लगी photo, शादी के'दिन वाली'?
बस उसी frameके किसी कोने में फस सा गया था. ....
जब बुलावा आया था , ग़ुस्सेमे बोल दिया नज़ाने मैंनेभी ,
" इस बार जल्दी ना आए तो देख लेना ,
चली जाउंगी छोड़ कर ,फिर मनाने मत आजाना !"
एक बात तक नहीं मानते थे मेरी , तो फिर क्योँ मानली मेरी ये बेतुकीसी बात ,
और आगये तिरंगे में लिपटे हुए मौत के साए के साथ। ........
जुल्फ़े मेरी मैं युहीं खुली छोड़ा करती थीं , तुम्हें वो सुलझाना पसन्द जो था
पर अब तो जुल्फ़ोने उलझानाही छोड़ दिया हैं !
अब आदत सी हो गई है तकिये को भी -रातभऱ आँसू ोंमें चुपचाप भीग जाने की
अब आदत सी हो गई है मुझेभी ,सुबह सिर्फ़ एक cup चाय बनाने की
अब आदत सी हो गई है, चाँद को शायराना'नज़रिए से ना देखने की
अब आदत सी हो गई है, लब्जोंको कागज़ पर बिना उतारे छोड़ देने की..............
-shruti.J.
Very nyc written dear ....
ReplyDeleteThanks a lot!
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